Chai and Shayari

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नज़्म : फ़रेब-ए-शब
जलते हुए दिए से पूछा, बहती हवाओं ने,
यह किसकी आरज़ू है, इन जलती बांहों में।

बुझ जाएगी हसरत तेरी, इन सर्द रातों में,
बिखर जाएगी तू किरणों सी, उसकी यादों में।

जलना ही मुक़द्दर है तेरा, यूँ ही ग़म न कर,
रोशन रख लिबास अपना, चाहे आँखें रहें तर।

दिए को बाती का साथ है, मुसाफ़िर का नहीं,
मुसाफ़िर को तलब सुबह की है, रात की नहीं।

जो हमसफ़र हो रात का, उससे उम्मीद न कर,
'नूरम' यह वादा रात का है, नज़्म-ओ-तन्ज़ीम न कर। 
(नज़्म-ओ-तन्ज़ीम=long-term commitment)
 





   


 

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