.
कविता : रिश्तों पर सवाल
मैं कथित 'आज की नारी' हूँ,
उलझन में फँसी, एक व्यथित हूँ।
क्या हैं शादी के मायने आखिर,
क्यों नहीं होते ये मुझ पर ज़ाहिर।
यह रिश्ता प्रेम का है या पैसों का?
ससुराल मेरा आधार है या अधिकार?
मैं स्वयं को धर्म में सहभागी समझूँ,
या घरेलू काम की वजह से नौकरानी?
मुझे खुद को माँ कहलाना पसंद है,
या परिवार बढ़ाने की मशीन?
मैं पति को जीवनसाथी समझूँ,
या मान्यता प्राप्त Legal एटीएम मशीन?
ससुराल वालों को परिवार मानूँ,
या कानूनी परिहास की तुच्छ वस्तु?
और यह प्रणय रिश्ता क्या है,
कैसे यह मेरे BF प्रेम से भिन्न है?
यदि विवाह त्याग, सेवा और कर्तव्य है,
तो दोनों तरफ़ से बरतना क्यों है?
फ़ीस और आराइश का निवेश कैसे वसूलूँ,
क्यों चरित्र को मैं मानवीय मूल्यों से तोलूँ?
मैं चाँद सी हूँ, 'नूरम', मैं चाँद पे उड़ जाऊँगी,
सब्सिडी का O₂ सिलिंडर साथ लेकर जाऊँगी।
सपनों को उड़ान दूँगी, ऐसा मादायान बनाऊँगी,
परिवार को लात मार, सशक्त नारी कहलाऊँगी।
0 Comments