Chai and Shayari

.
अधूरी थी नज़्म-ए-ज़िंदगी, तेरी दीद से पूरी हो गई।
अक्षर बिखेरे तेरे नाम के, रुबाई पूरी हो गई।
तारीफ की तेरे हुस्न की, मेरी ग़ज़ल पूरी हो गई।
नूरम' हमारी इंतज़ार-ए-वफ़ा में उम्र पूरी हो गई।

Post a Comment

0 Comments