Chai and Shayari


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जिन्हें निभाने में सब कुछ मिट गया,
मैं आज भी मानता हूँ उन रिश्तों को।
पर मेरी कब्र वीरान पड़ी रहेगी,
हाँ, मैं जानता हूँ अपने रिश्तों को।

जिन्हें रौशन किया अपना जिगर जलाकर,
उन्होंने छोड़ दिया, अँधेरे रास्तों में लाकर।
मंज़िल तो उन्हें नसीब न हुई होगी? 'नूरम',
पर क्या मिला होगा मेरा दिल दु:खाकर।

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