Chai and Shayari

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नज़्म : ग़लत क्या है? 

कुछ बातें बस सही होती हैं,

तो सही होती हैं, इसमें ग़लत क्या है?


कुदरत का भी मेदा है, ग़लत पचता नहीं है,

सच सामने आता है, तो आता है, ग़लत क्या है?


जो सवाल वक़्त से पूछे जाते हैं,

वक़्त आने पर ही जवाब आता है, ग़लत क्या है?


जिन रिश्तों में नाख़ून उग आए हों,

वो रिस्ते हैं, निभाए नहीं जा सकते, ग़लत क्या है?


हर ख़ामोशी बेवजह नहीं होती,

सन्नाटे भी सुनते-बोलते हैं, ग़लत क्या है?


कुछ ज़ख़्म दवा से नहीं भरते,

दुआ में भी असर होता है, ग़लत क्या है?


किस्मत भी लूटी जा सकती है,

पर लूट के माल में सुकून नहीं, ग़लत क्या है?


जिसके दिल में भी दिमाग़ हो,

उससे प्यार नहीं, व्यापार करना? ग़लत क्या है?


कुछ सही फ़ैसले दिमाग़ नहीं ले सकता,

दिल कर देता है, ग़लत क्या है?


इंसानियत ख़त्म हो तो जिरह भी बेमानी है,

कुछ मुद्दे बहस नहीं, सिर्फ़ न्याय माँगते हैं, ग़लत क्या है?


कुछ बातें बस सही होती हैं,

तो सही होती हैं, इसमें ग़लत क्या है।

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