Chai and Shayari

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अहद-ए-वफ़ा ही रस्म-ए-मुस्तर्द हुई,

और हसीनों को तो सिर्फ़ मोहब्बत हुई।

अब ये सुख़न करते हैं ख़ुदा-ए-मोहब्बत से,

'नूरम', अब तेरी मोहब्बत पर भी तर्दीद हुई।

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